August 25, 2019
Life Style

खोया बचपन

*छत पे सोये बरसों बीते*

*तारों से मुलाक़ात किये*

*और चाँद से किये गुफ़्तगू*

*सबा से कोई बात किये।*

 

*न कोई सप्तऋिषी की बातें*

*न कोई ध्रुव तारे की*

*न ही श्रवण की काँवर और*

*न चन्दा के उजियारे की।*

 

*देखी न आकाश गंगा ही*

*न वो चलते तारे*

*न वो आपस की बातें*

*न हँसते खेलते सारे।*

 

*न कोई टूटा तारा देखा*

*न कोई मन्नत माँगी*

*न कोई देखी उड़न तश्तरी*

*न कोई जन्नत माँगी।*

 

*अब न बारिश आने से भी*

*बिस्तर सिमटा कोई*

*न ही बादल की गर्जन से*

*माँ से लिपटा कोई।*

 

*अब न गर्मी से बचने को*

*बिस्तर कभी भिगोया है*

*हल्की बारिश में न कोई*

*चादर तान के सोया है।*

 

*अब तो तपती जून में भी न*

*पुर की हवा चलाई है*

*न ही नानी माँ ने कथा*

*कहानी कोई सुनाई है।*

 

*अब न सुबह परिन्दों ने*

*गा गा कर हमें जगाया है*

*न ही कोयल ने पंचम में*

*अपना राग सुनाया है।*

 

*बिजली की इस चकाचौंध ने*

*सबका मन भरमाया है*

*बन्द कमरों में सोकर सबने*

*अपना काम चलाया है।*

 

*तरस रही है रात बेचारी*

*आँचल में सौग़ात लिये*

*कभी अकेले आओ छत पे*

*पहले से जज़्बात लिये!!!*

Regards,

Gaurav kothari

Udaipur

9413093674.

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