नन्हें मासूम कन्धों पर भारी बस्तों का बोझ :(

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तुतलाना छोड़ कर बच्चे बड़े हो गए, स्कूल के पहले दिन ही भारी बोझ से झुक गए | ये दास्ताँ है आजकल के बच्चों की | मासूम बचपना बस्तों के भारी बोझ तले दब गया है | जो कंधे नादानी करते हुए उचकते हुए दिखने चाहियें, वो आज बस्तों के भार से इतने दुखते हैं कि उन्हें अब ख़ास मालिश की ज़रूरत महसूस होने लगी है | चेहरे की मुस्कान दर्द के पीछे खो गयी है |
क्या हो गया है हमारे देश की शिक्षा नीति को ? एक तरफ हम बात करते हैं कि बच्चे कल के भारत का भविष्य हैं और दूसरी तरफ हम उन्हीं बच्चों को अपनी मासूम ज़िंदगी जीने से वंचित रख रहे हैं | शिक्षा ना हुई एक दर्द भरा बोझ हो गयी !! बचपन खो रहा है किताबों के बढ़ते बोझ की वजह से और हम इसे सुदृढ़ भारत की कड़ी से जोड़ रहे हैं जो कि बहुत गलत है | थकी हुई कमज़ोर नींव से क्या कभी बुलंद इमारत बनी है ?
किताबी ज्ञान सब कुछ नहीं होता | बच्चों को प्रैक्टिकल ज्ञान की सख्त ज़रूरत होती है | उन्हें उन्हीं के तरीकों से सिखाना, कभी घर में कभी बाहर ले जाकर, जिससे वो खेल खेल में बहुत कुछ सीख जाएँ …ये अत्यंत आवश्यक है | नाज़ुक कंधे यदि बस्तों का बोझ उठाते उठाते ही थक गए तो विकास के बारे में सही धारणा बना ही नहीं पाएंगे | मुरझाई कलियों से फूल नहीं खिलते | वे सूख कर बिखर जाती हैं, और बिखरने के बाद की स्थिति सब जानते हैं |
बस्तों के बोझ को कम करना बहुत ज़रूरी है | यदि प्रथम अनुभव ही खराब हो तो उसका असर लम्बे समय तक रहता है | बच्चे तो गीली मिट्टी होते हैं, सही तरीके से कुम्हार बन कर ढालना पड़ता है | किताबों से क्या सब कुछ सीख सकते हैं हम ? नहीं ना | फिर क्यों बच्चों के लिए बोझ बढ़ाया जा रहा है ? आज के युग में जब विदेशों में भी अनुभव पर आधारित ज्ञान को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो हम क्यों नहीं कर रहे ? पुराने ज़माने में जब किताबों का चलन नहीं था, तब क्या बच्चे पढ़-लिख कर सीख नहीं रहे थे ?
ज़रूरत है उसी परिवेश में बच्चों को ढालने की जिसमें वे आदर करना, परोपकार करना और अन्य कई सुविचार सीखते थे | अनुभव से सीखते थे, शालीन आचरण अपनाते थे और अपनों के साथ मिलजुल कर रहना सीखते थे | किताबी ज्ञान ये सब नहीं सिखाता | स्कूली बस्तों के बढ़ते बोझ ज़िंदगी का बोझ ढोना नहीं सिखाते | किताबें बहुत कुछ सिखाती हैं, मगर छोटे बच्चों के लिए किताबों का बोझ दुखदायी होता है | बच्चों का नाज़ुक शरीर इस बोझ को झेलने के लिए नहीं बना | मगर बढ़ती दुनिया के साथ प्रतियोगी बनने के लिए बच्चों को इतना कष्ट देना बहुत अनुचित है |

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