April 17, 2024
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राजस्थान में तपती धूप में

राजस्थान में तपती धूप में भी व्यापार करने के लिए गाँव वालों को अकसर गाँव-गाँव शहर-शहर जाना पड़ता है| अब धूप हो तो प्यास तो लगेगी ही | जब वाटर कैम्पर या मिल्टन टाइप की बोतल का चलन नहीं था, तब भी ऐसी एक चीज़ थी जो पानी को ठंडा रखती थी | नहीं, हम सुराही की बात नहीं कर रहे | सुराही को तो सफर में ले जाना संभव नहीं, टूटने का डर जो रहता है |

पानी को ठंडा रखने के लिए जो चीज़ काम में आती थी उसे स्थानीय भाषा में छागल कहा जाता है | छागल बनाने के लिए चमड़े का या मोटे कैनवास नुमा कपड़े का इस्तेमाल किया जाता था | ये आज भी चलन में हैं | अक्सर फौजी लोग जो रेगिस्तान में ऊँट की सवारी करते हुए इधर उधर जाते हैं, वे छागल में ही पानी भरके ले जाते हैं |

छागल में पानी उतना ही ठंडा या नार्मल टेम्परेचर पर रहता है जितना किसी भी आम मिट्टी के घड़े में | जब पानी ख़त्म हुआ, किसी टाँके से पानी भरा और बढ़े चले सफर पर | एक रस्सी के साथ छागल को ऊँट की गर्दन से लटका दिया जाता है | लू के थपेड़ों का भी असर नहीं होता पानी के तापमान पर | 

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